ईमान से सच्चाई को पकड़ें कोई कमी नहीं

ईमान से सच्चाई को पकड़ें
कोई कमी नहीं

     बोलिए परमप्रभु परमेश्वर की ऽऽ जय ! ‘धर्म’ जो है, किसी वर्ग-सम्प्रदाय अथवा मन्दिर-मस्जिद और ग्रन्थों में बँधा हुआ कोई विधान नहीं है । किसी भी ग्रन्थ में या किसी भी पन्थ में बँधा हुआ ‘धर्म’ नहीं होेता । ‘धर्म’ सम्पूर्णता को लिए हुये एक सम्पूर्ण एवं सर्वोच्च जीवन विधान है । आप-हम सभी का जीवन, जीवन विधान है और कोई अलग चीज नहीं है । यदि सब लोग भगवन्मय रहने-चलने लगें तो इसमें समर्पण-शरणागत होने की आवश्यकता ही न पडे़ । वास्तव में ईमान से सच्चाई के अनुरूप हर कोई चलना शु़रू कर दिये होता, चल रहा होता तो समर्पण-शरणागत होने की आवश्यकता नहीं थी । किसी शर्त की कोई आवश्यकता थी ही नहीं। यदि आप-हम सभी जो हैं, ईमान से सच्चाई को पकड़े हुए ‘सत्य’ के अनुरूप अपने कर्तव्य का पालन करने लगते तो समर्पण-शरणागत होने की भी आवश्यकता नहीं थी । सब परमेश्वर के हैं ही। सब परमेश्वर के हैं   ही ! इसमें किसी भी कण्डीशन या शर्त की आवश्यकता क्यों ? यह समर्पण-शरणागत जो है, केवल इस बात को लेकर है कि आप-हम सभी मनमाना हो गये हैं । यानी यह मनमाना होने का मतलब है कि आप-हम सभी अपने लिंक से उतर चुके हैं । आप-हम सभी अपने कर्तव्य से गिर चुके हैं । और इतना गिर चुके हैं, इतना विचलित हो चुके हैं, इतना विचलित हो चुके हैं कि वगैर कठोर अनुशासन के लिंक पर आना आसान नहीं है । प्रारम्भिक समय से लिंक पर लाने के लिये कठोर अनुशासन की जरूरत है फिर तो लिंक पकड़ने के बाद किसी भी अनुशासन के बिना भी काम कर जायेगा । यानी कुल मिला करके आप को होना क्या है, करना क्या है, बनना क्या है ? बस ! ईमान और सच्चाई से, ईमान और सच्चाई से जीवन को उतार देना है । ईमान और सच्चाई से अपने जीवन को जोड़ देना है । तदात्म कर देना है । एकीकृत रूप में कर लेना है । फिर जब सच्चाई को पकड़ कर रहने-चलने लगेंगे, अपने कर्तव्य का पालन करने लगेंगे तब मिलेगा क्या ? हमको  किसी भी चोरी, छल, कपट की आवश्यकता नहीं पड़ेगी । कोई कमी रहेगी ही नहीं, फिर किसी विकृति की आवश्यकता ही क्यों ? ये सारे गड़बडि़याँ हमारे-आपके कमी के चलते ही हैं । हमारे पास कमी है ईमान   की । बेइमान हो गई दुनिया । अपने कमी की पूर्ति के लिये बेइमान हो गई । जब बेइमान रहेंगे तो कुछ भी करेंगे तो विकृति ही करेंगे । चोरी करेंगे, छल करेंगे, लूटपाट करेंगे, मारकाट करेंगे, नाना तरह से विकृति से गुजरते जायेंगे, लेकिन जब हम देखेंगे कि हमारा मूल चीज यह धन नहीं है, रुपया- पैसा नहीं है, तो पायेंगे कि हमारा मूल चीज है ‘सत्य’ है । हमको ईमान से ‘सत्य’ को पकड़े रहना है । जब ईमान से ‘सत्य’ को पकड़ लेंगे तो कर्तव्य तो उसमें हो जाता है। उसमें कर्तव्य का पालन होने लगता है, हो जाता है । इसके लिए कोई बहुत परेशान होने की आवश्यकता नहीं पड़ती । हम मर कर अमर हो जायेंगे, हम अमरलोक के वासी हो जायेंगे, हम परमधाम के वासी हो जायेंगे, मर जायेंगे तो ऐसा हो जायेंगे, वैसा हो जायेंगे-- ऐसा कुछ नहीं है । जो होना है जीते जी ही होना है । जो होना है जीते जी ही हो जायेंगे । जो जीते जी नहीं बनेंगे तो मरने के बाद क्या बनेंगे । जो बनेंगे, जीते जी ही बनेंगे । जो जानेंगे, जीते जी ही जानेंगे । जो पायेंगे, जीते जी ही   पायेंगे । मरने के बाद मुक्ति मिलेगी, ऐसा नहीं है । जिस मुक्ति को पाना है वह जीते जी ही दिखलाई देगी कि हाँ हम मुक्त हो गये । हम माया मुक्त हो गये । हम पापमुक्त हो गये। हम कर्म मुक्त हो गये । हम आवागमन से मुक्त हो चुके हैं । ये जीते जी दिखलाई देगा । बस इतना एक चीज उसमें अनिवार्यतः अपनाना पड़ता है । बस, भगवान् से युक्त होना होगा । जब तक भगवान् से युक्त नहीं होंगे, तब तक माया से मुक्त कैसे होंगे ?                                       
स्वार्थ और परमार्थ
      जीव कभी भी स्वतन्त्र नहीं रह सकता । जीव कहीं भी स्वतन्त्र नहीं रह सकता, यह आप जान लीजिए । स्वतन्त्र रहे और शरीर भी रहे-- ऐसा नहीं हो सकता । या तो वह शरीर में रहकर क्रियाशील रहेगा या परमेश्वर में रहकर क्रियाशील रहेगा । इसीलिये दो शब्द बना है-- स्वार्थ और परमार्थ । आत्मार्थ कोई शब्द नहीं बना । ईश्वरार्थ कोई शब्द नहीं बना । ब्रह्मार्थ कोई शब्द नहीं बना । स्वार्थ यानी ‘स्व’ जीव जब शरीर प्रधान होकर काम करता है, शरीर वालों के लिये काम करता है तब इसको स्वार्थ कहते हैं । अर्थात् जीव जो है इस अपने शरीर और अपने शरीर वाले ‘स्वजन’ के लिए जब अपने को लगे-लगाया रखा होता है, तब वह स्वार्थ कह लाता है । स्वजनों के हित-लाभ-साधन के लिये जब काम करता है तो ‘स्वार्थ’ कहलाता है । यह ‘स्वार्थ’ सबसे अधिक निन्दनीय है । सर्वथा निन्दनीय है । स्वार्थी सीमित-संकुचित दायरे में रहने वाला होता है । परिवार से ग्रसित होकर संयुक्त होगा तो निज परिवार बनायेगा । निज परिवार में भी उसको सन्तुष्टि नहीं होगी, वह निजी परिवार बनाना चाहेगा । वहाँ भी उसे सन्तुष्टि नहीं होगी । तब वह अपने शरीर के नाम का बनाना चाहेगा । इसमें भी उसे सन्तुष्टि नहीं होगी । कहीं सन्तुष्टि नहीं ! सन्तुष्टि मिलती है परमार्थ में । समाज का तो हमें नाजायज छूना नहीं   है । सरकार का तो हमको नाजायज छूना नहीं है । किसी दूसरे का नाजायज हमको छूना नहीं है, बल्कि अपना भी जो है उसको भी परमेश्वर के तरफ से समाज को सुपुर्द कर देना है । जो अपना निज है, जो अपना ‘स्व’ के लिए है, स्वजन के लिए है उसको भी परमेश्वर के तरफ से समाज के लिये कर देना है । यह परमार्थ कहलाता है । परमेश्वर के माध्यम से जब समाज में ले जायेंगे तो ‘परमार्थ’ हो जायेगा । अगर सीधे समाज में ले जायेंगे तो परोपकार हो जायेगा, परमार्थ नहीं । परोपकार करके आप पापमुक्त हो जायेंगे-- ऐसा कदापि सम्भव नहीं है । परमार्थ ही है जो आप को मुक्त करेगा पापों से, बन्धनों से, आवागमन से । किसी से वस्तु-सम्पत्ति ले करके हम दूसरे को दान कर दें, हम आपसे कोई वस्तु ले करके या आपके धरोहर वस्तु को किसी के उपकार में लगा दें, तो पुण्य तो जरूर होगा लेकिन जिसका है उसको वापस न देने से पाप भी तो रहेगा ही रहेगा । बन्धन भी रहेगा, भार भी रहेगा । किसी को किसी वस्तु के दान करने का अधिकार तब है जब वह वस्तु उसकी निज की हो निज की । दूसरे की वस्तु या धरोधर-वस्तु किसी को दान देने का अधिकार नहीं होता है ।
                                             संसार में सबकुछ भगवान् का
       आप एक बार पूछें तो सही ! क्या आपके निज नाम का कुछ है। एक बार जब सत्य के तरफ मुड़ेंगे, सच्चाई के साथ जब देखना शुरू करेंगे, जानना शुरू करेंगे तो पता चलेगा कि यहाँ का एक परमाणु भी हमारा नहीं है । जो ‘हम’ है, वह भी हमारा नहीं है ।  बार-बार शब्द आता है -- ‘ज्ञान ज्ञान ज्ञान’। आखिर ‘ज्ञान’ माने क्या ? सत्य का अर्थ है परमेश्वर । परमेश्वर सम्पूर्ण है । ब्र्रह्माण्ड में जो कुछ है सब परमेश्वर से है, परमेश्वर का है और परमेश्वर में है । इसी को जब जानेंगे तो पता चलेगा कि सम्पूर्ण जान गये । जब तक परमेश्वर को नहीं जानेंगे तब तक यह नहीं कह सकते कि सम्पूर्ण को जान गये । आप ईश्वर तक के जानकारी को ले लिये हैं तो पता चलेगा कि परमेश्वर तो परमेश्वर है, आप किसी भी चीज के आदि-अन्त को नहीं जान पाये हैं । ब्रह्माण्ड में जो कुछ भी है, सब का आदि-अन्त परमेश्वर के हाथ में है ।
        जरा सा देख लीजिए कि आप जिस श्वास से आप जीवित कहला रहे हैं, उस श्वास के रहस्य को जानकर लोग महात्मा जी बन जा रहे हैं, भगवान् जी बन जा रहे हैं । मूलाधार से आज्ञाचक्र के बीच जो श्वास की क्रियायें हैं, बस इसी खेल में ये सोऽहँ वाले भगवान् जी बन जा रहे हैं । उनसे पूछा जाय कि श्वास कहाँ से आ रहा है ? श्वास को सब ले रहे हैं बाहर से । स्वयं देख लीजिये श्वाँस बाहर से ले रहे हैं । इनमें से जो ये कहते हैं कि श्वास भीतर ही पैदा हो रहा है, जो योगी-साधक कहते हैं कि सारा ब्रह्माण्ड भीतर ही है, बाहर कुछ नहीं है-- मिथ्या है, सब मिथ्या है, जो कुछ भी है सब भीतर ही है तो जरा इनके नाक को एक बार दबाकर कहिये तो कि भीतर क्या है ? यानी बाहर से श्वास का अन्दर जाने को बन्द करके पूछिये कि भीतर क्या है ? कुछ ही देर में उनकी हालत कैसी हो जायेगी ? उनकी क्या स्थिति है ? बहुत लोग तो पार जाने लगेंगे । इनका सारा ज्ञान जो है, सब किनार हो जायेगा । जो कुछ है भितरै है, भगवान् जो है भितरै है, बाहर कुछ नहीं है -- तो बस बाहर से श्वास रोक दीजिये । इनकी कुल गती होने लगेगी । तब इनसे पूछिये कि श्वास तो बाहर से न आ रहा है ! बाहर कहाँ से आ रहा है ? अन्दर से निकल कर बाहर कहाँ को जा रहा है ? कहाँ से आ रहा है और कहाँ को जा रहा है । सारा खेल तो इसी का है । इसी बीच में जो खेल शरीर के अन्दर हो रहा है, बस उतना  ही में तो ये फूल गये । इसके बाहर में किसी को कोई जानकारी नहीं है । पूरे कुम्भ मेले में घूम लीजिये और बताइये कि कौन है जो इसके बाहर की जानकारी वाला है । कोई नहीं मिलेगा । कौन कहता है कि इसके बाहर की उसको जानकारी है ? जीव को तो जानता ही नहीं है, इतने बड़े मेले में एक भी महात्माजी नहीं जो कह दे कि मैंने जीव देखा है । मैने आत्मा देखा है --यह कह सकते हैं, लेकिन जीव के बारे में नहीं बोल सकते । नीचे जीव और ऊपर परमेश्वर -- दोनों की जानकारी केवल परमेश्वर के पास रिजर्व रहता है । जीव का कार्य करने-कराने वाला यमराज भी नहीं कह सकता कि मैंने जीव देखा है । शंकरजी जीव का संहार करने वाले होते हैं । वे भी नहीं कह सकते कि मैंने जीव को देखा है । परमेश्वर के इतने से रहस्य में तो यह दुनिया है, दुनिया के Ûियाकलाप हैं । विचित्र रहस्यमय यह सृष्टि है । झट से सुन लें, झट से जान लें -- ऐसा नहीं है । रोज जाग रहे हैं और रोज सो रहे हैं आप । कभी विचार नहीं किया कि यह सोना-जागना क्या है और क्यों है ? इसी एक सवाल पर तो सबका मामला गोल हो जायेगा । नींद क्या है और क्यों है -- कौन है धरती पर जो जानता है ? कोई नहीं ! किसी महात्माजी को भी नहीं मालूम । किसी गुरुजी को नहीं मालूम। युनिवर्सिटि के मनोवैज्ञानिकों से पूछ लीजिये न ! क्या है और क्यों है ? कोई बता दे न ! वे बतायेंगे कि दिमाग में जो है, ब्रेन में तरंगे उत्पन्न करके जगा देंगे । लेकिन यह नींद है क्या और क्यों है-- इस पर उनका भी मामला गोल ! गुरुजी लोग उपदेश तो दे रहे हैं लेकिन एक ही कोई बतावे न कि सोना-जागना क्या है और क्यों है। शंकरजी को भी नहीं मालूम । यह इतना हल्का रहस्य नहीं है । परमेश्वर के महान रहस्यों में से यह भी एक रहस्य है । सृष्टि चलाने में, घर-परिवार चलाने में इसका बड़ा योगदान है । यदि इनके रहस्यों को आदमी वास्तव में समझ ले तो काहे को संसार ! कैसा घर-परिवार ! कैसा माता-पिता ! सब कोई कुछ रह ही नहीं जायेगा । इतना महान रहस्य परमेश्वर का इसमें छुपा हुआ है । इस रहस्य को जानने का नतीजा है कि सब गुरु जी लोगों को फँसाते जा रहे हैं । पता नहीं ये गुरुवाई क्यों कर रहे हैं । किस बात के गुरुजी हैं   ये ? गुरु होता है ‘ज्ञान’ के लिये । ‘ज्ञान’ होता है भगवान् पाने के लिये । भगवान् होता है मुक्ति-अमरता देने के लिये । मुक्ति-अमरता मिले --यह जीवन का पहला लक्ष्य है । शरीर में आये तो यश-कीर्ति भी हो --यह दूसरा लक्ष्य है । यानी जीव को मोक्ष और जीवन को यश-कीर्ति । रही बात रोटी-कपड़ा-मकान-साधन और सम्मान की तो वह तो पीछे-पीछे रहती है फिरती फिरती । इसके लिये भी जीवन बेंचना पड़ेगा । रोटी-कपड़ा-मकान के लिये भी जीवन बेंचना पड़ेगा । जीव ही न हो तो मुख न हो । मुख के लिये ही तो रोटी-कपड़ा बिजनेस-व्यापार होता है । ज्ञानी कभी रोटी के लिये जीवन नहीं बेचेगा ।
                       
                             जो जिस स्तर का उसकी वैसे ही क्षमता सामथ्र्य
        हर चीज की श्रेणियाँ बनी हुई हैं । अपना एक स्तर बना हुआ है। उसका स्तर निर्धारित है । कौन किस स्तर का है, कौन किस श्रेणी का है, कौन किस अस्तित्त्व का है उसी अस्तित्त्व के आधार पर ही उसकी क्षमता-सामथ्र्य भी होगी । जैसे कोई सिपाही हो गया है तो सिपाही के अन्तर्गत जो क्षमता-शक्ति-अधिकार होता होगा, वह शरीर उससे प्रभावित होने लगेगा । जब दरोगा जी हो जायेंगे तो दरोगा के अन्तर्गत जो क्षमता-शक्ति होगी वह उस शरीर से प्रभावित होने लगेगी । यदि हम एस0 पी0 हो गये तो एस0 पी0 यानी सुुप्रिंटेण्डेण्ट आॅफ पुलिस शब्द की जो क्षमता-शक्ति व अधिकार होगी उससे वह शरीर प्रभावित होने लगेगी । तो जिस श्रेणी या पद से आपकी शरीर जुड़ेगी, बस उसी के क्षमता-शक्ति से प्रभावित हो जायेगी । जीव के स्तर पर अपने को स्थापित कर लेंगे तो आपमें जीव स्तर की क्षमता-शक्ति प्रधान हो जायेगी । आप अपने आप को ब्रम्ह में विलीन करेंगे या उस श्रेणी में जोड़ेंगे और उस श्रेणी में जोड़ रहने-चलने लगेंगे तो उस आत्मा- ईश्वर-ब्रह्म की क्षमता-शक्ति आप से प्रवाहित होने लगेगा । इसी प्रकार जब आप परमात्मा-परमेश्वर-परमब्रह्म-खुदा-गाॅड-भगवान् को जान लेंगे, उस परमात्मा- परमेश्वर खुदा-गाॅड-भगवान् को जान लेंगे और उससे अपने आप को जोड़ करके रहने चलने लगेंगे तो उसकी सुप्रिमेसी और सर्वोच्चता आप से प्रवाहित होने लगेगी । आपको पता नहीं चलेगा कि आप क्या बोल रहे हैं । सुनने वाला कहेगा कि ‘आप तो बहुत ऊँचे स्तर का बोल रहे हैं, हम तो आत्मविभोर हो गये, आप इतनी इतनी गम्भीर बात बोल रहे हैं, आपने तो कमाल कर दिया । ये आप ने कहाँ से सीखा है, इतनी मर्यादित बात और इतना गहन बात आपने रखा कि बड़ा आनन्द आया । आदि आदि ।’ बोलने वाले को पता ही नहीं चलेगा कि वह क्या बोल रहा है । बोलने वाला (ज्ञानी जो परमेश्वर वाला है ) जो जैसा जाना है अपने सद्गुरु से, उसी के विषय में बोलना-कहना शुरू कर दे । वह कुछ मतलब न रखे वह क्या बोल रहा है । एक बार परमेश्वर का स्मरण कर बोलना शुरू कर दे । परमेश्वर को देखा है, जाना है, बस वही बोलना शुरू कर दे । वह जो कुछ भी बोलेगा वह र्कुआन शरीफ ही तो होगा, बाइबिल ही तो होगा । अनपढ़ भी होगा तो बोलेगा वह दुनिया के सद्ग्रन्थ ही तो होंगे । इस प्रकार उस खुदा-गाॅड-भगवान् की सुप्रिमेसी प्रवाहित होती है ।
                                                        

                                                           लौकिक-पारलौकिक
        दो क्षेत्र हैं । कर्म या माया का क्षेत्र और धर्म या भगवान् का क्षेत्र। शरीर- परिवार-संसार माया क्षेत्र या लौकिक कहलाता है । जीव-ईश्वर-परमेश्वर पारलौकिक हैं । जैसे बीच में कोई दरिया हो और आप इस पार हो तो किसी विशेषण की जरूरत नहीं है । इसको ‘लौकिक (लवकिक-- यानी लवकने वाला) कहते हैं । जब उस पार की बात करनी है तो पारलौकिक कहना होगा । यानी बैरियर है बीच में जो अवरोधक है तो इसमें अब आप उस पार के लिये विशेषण देकर बात करना होगा । उस पार भी ‘लौकिक यानी लवकने वाला’ है । लौकिक इधर भी है और लौकिक उधर भी है। यह मृत्यु क्षेत्र है । यहाँ जो आया है वह मरेगा ही । जो आया है वह जायेगा ही । इसमें उसको उस पार जाना है क्योंकि आये हैं उसी पार से । अस्तित्त्व उस पार का ही है । मूलतः अस्तित्त्व उस पार वाले का ही है । इस पार वाले का मूलतः अस्तित्त्व नहीं है । उस पार-लौकिक का यह इस पार वाला लौकिक डुप्लीकेट फोटोस्टेट कापी है । अपने आप में अलग से यह कुछ है नहीं ! हम लोग जो दर्शन कराते हैं जीव-ईश्वर-परमेश्वर का, जब दर्शन कराने चलेंगे तो दिखला देंगे कि ये दुनिया कहाँ है, तेरा घर-परिवार तेरा संसार कहाँ है, कुछ नहीं है । अब यह बता दो न कि तुम्हारी शरीर ही कहाँ है, सब निल्ल ! यह दर्शन पहले दिन ही होगा । यह जो आप पढ़-सुन रहे हैं कि ‘ब्रह्म सत्यम् जगन्मिथ्या !’ इसको आप लोगों ने पढ़ा मात्र है । अब देखने को मिलेगा । महात्माजी लोग तर्क से सिद्ध करते हैं क्योंकि दिव्य-दृष्टि तक उनको जानकारी होती है, ज्ञान-दृष्टि तो उनको कुछ पता ही नहीं होता है इसलिये उन्हें तर्क से सिद्ध ही करना पड़ता है । ब्रह्म सत्य है और जगत् मिथ्या है-- इसे ज्ञान-दृष्टि से देखना होता है तर्क से सिद्ध नहीं किया जाता है ।
        जो हमारी असली आँख है जिसे हम-आप भूल चुके हैं कि हमारी असली आँख कहाँ है, ये जो मिट्टी की आँख है, ये हमारी असली आँख नहीं है । आप ‘हम’ शरीर नहीं हैं । ‘हम’ शरीर होता तो यही शरीर वाली आँख हमारी असली आँख होती । असलियत तो यह है कि यह शरीर हमारी है, ‘हम’ शरीर नहीं है। ‘हम’ इस शरीर में जब तक है, तब तक यह शरीर जीवित है । यह शरीर क्रियाशील है । ‘हम’ शरीर छोड़ दे तो कोई नहीं इस संसार में जो इस शरीर को रख कर अपना बना ले ।
  
                           (जीव-ईश्वर-परमेश्वर) पारलौकिक पूरी तरह द्रष्टव्य
यह ‘हम’ क्या है, कौन है, किसलिये आया है, कैसे है और कहाँ जाना है ? ये पाँच तो हर किसी को जानना चाहिये । हर किसी के लिये अनिवार्य है । अभी कहीं सड़क पर खड़े हों और दरोगा जी आप से पूछें कि आप कहाँ से आये हैं ? आप कहें कि पता नहीं ! कहें कि किसलिये खड़े हो ? कह दें कि पता नहीं ! पूछें कि कहाँ जाना है ? बताने लगें कि हमको तो पता नहीं है ! तब दरोगाजी कहेंगे कि चल चल हमको पता है कि कहाँ जाना है, चल भीतर, वहीं से घर का पता चल जायेगा । वहीं से घर चले जाना । कोई दफा नहीं है, कोई अपराधी केस नहीं है, बस शब्द है लावारिस । ये लावारिस है। अब लावारिस को जब जेल में ले जाये तो कुछ नहीं करना है । बस वारिस हैं, इतना ही बता दीजिये और ले जाइये जेल से । हर किसी को कम से कम अपना पता, अपनी इतनी जानकारी होनी चाहिये न ! ‘हम’ कौन है, ‘हम’ कहाँ से आया है, किसलिये आया है, ‘हम’ को कहाँ जाना है ? ये प्रश्न शरीर के साथ भी जुड़ा है और जीव के साथ भी जुड़ा हुआ है । ये प्रश्न आत्मा- ईश्वर-ब्रह्म के साथ भी जुड़ा हुआ है और परमात्मा-परमेश्वर-परमब्रह्म-खुदा- गाॅड-भगवान् के साथ भी जुड़ा है । ये केवल शरीर के साथ नहीं है, जीव के भी साथ है और आत्मा के भी साथ है और परमात्मा के भी साथ है । जैसे शरीर दिखलाई देता है वैसे जीव भी दिखाई देने वाला है । आत्मा-ईश्वर-ब्रह्म भी दिखाई देने वाला है और परमात्मा-परमेश्वर-परमब्रह्म या खुदा-गाॅड-भगवान् भी दिखाई देने वाला है । आप नहीं देखते हैं, इसका मतलब यह नहीं कि दिखाई देने वाला नहीं है । जैसे शरीर-परिवार-संसार दिखाई देने वाला है यानी लउकने वाला (लौकिक) है वैसे ही जीव-ईश्वर-परमेश्वर भी दिखाई देने वाला (लउकने वाला पारलौकिक) है । जीव का क्षेत्र, ईश्वर का क्षेत्र और परमेश्वर का क्षेत्र तीनों पारलौकिक में होता है । जीव और जीव जगत्, ब्रह्म और ब्रह्मलोक, परमब्रह्म और अमरलोक ये जो क्षेत्र हैं --ये तीनों पारलौकिक में आता है । लौकिक में आ गया शरीर-परिवार-संसार  । पारलौकिक में आ गया जीव-ईश्वर-परमेश्वर । अब आप-हम न देखें, अपनी आंखों को बन्द कर लिया करें और कह दे कि दिखाई नहीं देता है, हमको तो कुछ दिखाई नहीं दे रहा है तो इस पर एक  द्रष्टान्त है ।
       एक व्यक्ति गया चश्मा खरीदने पावर वाला । अब उसको चाहे मजाक सूझा हो या जानकारी ही न हो, दुकान पर कहने लगा कि चश्मा दे दीजिये । चश्मे वाले ने एक-एक नम्बर का चश्मा लगा-लगा कर टेस्ट करने लगा । जब चश्मा लगाता था तो वह अंखिया बन्द करके कहता था कि हमको तो कुछ दिखाई नहीं देता है । कुछ नहीं दिख रहा है, दूसरा दें । दूसरा लगाया तो फिर अंखिया बन्द करके देखा तो कहा हमको तो कुछ भी नहीं दिखाई दे रहा है, दूसरा दीजिये । देखते-देखते सब चश्मा पहना कर टेस्ट कर लिया । बहुत फेर में पड़ गया । आँख तो इसके पास है ही, यह कैसा है कि इसको दिखाई नहीं देता है । फिर लगाया तो देखा कि यह तो अपना अंखिया बन्द कर ले रहा है । पूछा अंखिया क्यों बन्द कर ले रहे हो ? बोला कि जब हम ही देखेंगे तो चश्मे का पावर कहाँ गया ? हम तो चश्मे का पावर देख रहे थे कि इसका पावर है कि नहीं, इसलिये ही तो अपनी अंखिया बन्द कर लेते   थे । ‘अरे भाई ! चश्में में देखने का पावर नहीं होता है। देखना तो आपको है । आपके आँख में जो भी गड़बड़ी होती है, उस गड़बड़ी के लिये यह सहायता करता है । यह देखता-दिखाता नहीं है । यह देखने में सहायता करता है, न कि देखता   है । तो उसी तरह से कोई भी काम देखना  है । ‘हम’ को देखना है अपनी आँख से न देख करके चश्में की आँख से देेखना है। हम अपनी इस आँख का सहारा न ले करके चश्में से देख रहे होंगे । चश्मा देखता नहीं है, देखने में सहायता करता है, न कि देखने का काम करता है । हाँ, दिखाने का काम करता है । आप अपनी आँख बन्द क्यों कर लिये हैं ?
       इन (शारीरिक) आँखों से ‘हम’ ही देख रहा है लेकिन सच्चाई यह है कि ये आँखें हम को मिली हैं किसलिए ? ये आँखें हमको मिली हैं इस पन्च भौतिक संसार को देखने के लिये । ये पन्च भौतिक आँख हैं । जब लाल रंग का चश्मा लगाकर देखेंगे तो सब लाल ही लाल दिखाई देगा और हरे रंग वाले चश्मे से देखना शुरू करेंगे तो सब हरा ही हरा दिखाई देने लगेगा । इसका कत्तई यह अर्थ नहीं हुआ कि सब लाल या हरा है । हमको रंगीन चश्मा उतार कर देखना होगा या रंगहीन चश्मा पहन कर देखना होगा तब सब अपने वास्तविक रूप में दिखाई  देगा । या तो आप इस खुली आँख से देखिए या फिर ज्ञान का चश्मा लगा लीजिये । ज्ञान में कोई रंग नहीं होता है । रंगहीन चश्मा का मतलब है ज्ञान का चश्मा । ज्ञान में रंग नहीं होता है यानी ज्ञान में कोई स्त्री-पुरुष, लड़की-लड़का, माई-बाप नहीं होता है । ज्ञान में कोई जाति नहीं होता है । बाबू साहब, लाला जी ,साहू जी आदि नहीं होता है । ज्ञान में जीव-ईश्वर-परमेश्वर होता है । और जीव-ईश्वर-परमेश्वर में कोई जाति नहीं होती है । ज्ञान में कोई वर्ग-सम्प्रदाय नहीं होता है। ज्ञान में कोई हिन्दू नहीं होता, कोई मुस्लिम नहीं होता । कोई सिक्ख नहीं होता, कोई ईसाई नहीं होता, पार्सी नहीं होता । ज्ञान में जीव-ईश्वर और परमेश्वर इन तीन का ही अस्तित्त्व है । शरीर-परिवार-संसार का भी अस्तित्त्व नहीं है ज्ञान में ।
       हम कोई नयी मशीन खरीदने जाते हैं तो उसका लीफलेट लेना पड़ता है । एक छोटी सी किताब उसके साथ मिलती है । उसमेें सब कुछ लिखा रहता है । उसका रख-रखाव, उसको चलाने की सावधानियाँ आदि सब कुछ लिखा रहता है उसमें । और यह शरीर तो एक ऐसी मशीन है, यह साढ़े तीन हाथ का पुतला यह जो पिण्ड है, दुनिया की सारी मशीनें इसी से बनती हैं । यही मशीन दुनिया की सारी मशीनों को बनाता है और उन्हें आपरेट भी करता है । मानव रहित जो विमान हैं, उन्हें भी यही मशीन (शरीर) चलाती है । फर्क इतना है कि उसमें बैठकरके न चलाकर उसे कन्ट्रोल-रूम में, अपने नियन्त्रण-कक्ष में, अपने स्टेशन पर बैठकर चला रही है और अंतरिक्ष में जो मानव रहित राकेट जा रहे हैं, उनके लिये ऐसा नहीं है कि मनुष्य उसे नहीं चला रहा है । उसको भी यही मशीन चला रही है । तो यह मशीन जो दुनिया के सारे मशीनों को चला रही है, उसे भी जानना चाहिये । यह जो मशीन है इसका भी लीफलेट, बुकलेट हैं धर्मशास्त्र जिसमें इस मशीन से सम्बन्धित सब जानकारियाँ मौजूद हैं । यह किसलिये है, इसे कैसे आपरेट करेंगे, इसे कैसे मंजिल तक ले जायेंगे-- आदि आदि की जानकारियों को देने वाले को ही तो धर्मशास्त्र कहते हैं । इसका मेकैनिक ही तो सन्तपुरुष कहलाता है । उसको देखना-जानना पता करना चाहिये ।
परमपूज्य संत ज्ञानेश्वर स्वामी सदानन्द जी परमहंस